Friday, September 29, 2017

जीव विज्ञान और उसकी प्रमुख शाखाए

                 जीव विज्ञान

जीव विज्ञान प्राकृतिक विज्ञान की तीन विशाल शाखाओं में से एक है। यह विज्ञान जीव, जीवन और जीवन के प्रकृया से सम्बन्धित है । इस विज्ञान में पेड़-पौधों और जानवरों के अभ्युदय, इतिहास, भौतिक गुण, जैविक प्रक्रम, कोशिका, आदत, इत्यादि का अध्ययन किया जाता है इसे अंग्रेजी में बायोलॉजी (Biology) कहते है यह Bio + logos से बना है इसमें bio का अर्थ है जीवन ( life) और logos का अर्थ है अध्ययन (study)  ।

अर्थात जीवन का अध्ययन ही बायोलॉजी कहलाता है जीव विज्ञान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग  लैमार्क (फ्रांस) ने एवं ट्रेविरेनस (जर्मनी) नामक  वैज्ञानिकों ने 1801ई में किया था ।

जीव विज्ञान का क्रमबद्ध ज्ञान के रूप में विकास प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक अरस्तु के काल में हुआ उन्होंने ही सर्वप्रथम पौधों एवं जंतुओं के जीवन के विभिन्न पक्षों के विषय में अपने विचार प्रकट किए इसलिए अरस्तु को जीव विज्ञान का जनक कहा जाता है इन्हें जंतु विज्ञान के जनक के रूप में भी जाना जाता है।

           जीव विज्ञान की कुछ प्रमुख शाखाये

(1) एपीकल्चर  - मधुमक्खी पालन का अध्ययन

(2) सेरीकल्चर - रेशम कीट पालन का अध्ययन

(3) पीसीकल्चर - मत्स्य पालन का अध्ययन

(4) माइकोलोजी - कवको का अध्ययन

(5) फाइकोलॉजी - शैवालों का अध्ययन

(6) एंथोलॉजी  - पुष्पों का अध्ययन

(7) पोमोलॉजी -फलों का अध्ययन

(8)ऑरनिर्थोलॉजी - पंछियों का अध्ययन

(9) इक्थ्योलॉजी -  मछलियों का अध्ययन

(10) एन्टोमोलॉजी - कीटो का अध्ययन

(11) डेन्ड्रोलॉजी -  वृक्षों एवं झाड़ियो का अध्ययन

(12) ओफियोलॉजी - सर्पो का अध्ययन

(13)सॉरोलॉजी - छिपकली का अध्ययन

(14) सिल्वीकल्चर - काष्ठी  पेड़ों का अध्ययन

Thursday, September 21, 2017

आक्सीजन

ऑक्सीजन, धरती का तीसरा सबसे ज्यादा पाया जाने वाला तत्व (elememt) है. सबसे अधिक हाॅइड्रोजन और फिर  हिलियम पाया जाता है ।

ऑक्सीजन सभी प्राणियों के लिए बहुत आवश्यक है ऑक्सीजन रंगहीन, स्वादहीन तथा गंधरहित गैस है इसका रासायनिक सूत्र O है और इसको हिंदी में प्राणवायु या जारक भी कहा जाता है।

आक्सीजन की खोज -
ऑक्सीजन गैस की खोज 1772 में सर्वप्रथम स्वीडन के शीले नामक वैज्ञानिक ने की थी। ऑक्सीजन की खोज, प्राप्ति अथवा प्रारंभिक अध्ययन में जे. प्रीस्टले और सी.डब्ल्यू. शीले ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था कार्ल शीले ने पोटैशियम नाइट्रेट को गर्म करके आक्सीजन गैस तैयार किया पर उनका कार्य बाद में उजागर हुआ एन्टोनी लैवोइजियर ने इस गैस के गुणों का वर्णन किया तथा इसका नाम आक्सीजन रखा, जिसका अर्थ है – ‘अम्ल उत्पादक’

ऑक्सीजन का भौतिक गुण:

द्रव ऑक्सीजन नीला होता है और  वायु से कुछ भारी भी होता है यदि हम आक्सीजन को ठंडा करते है तो ऑक्सीजन नीले रंग के द्रव में परिवर्तित हो जाएगी।

ऑक्सीजन जलने में या जलाने में सहायक होती है लेकिन अपने आप कभी भी नहीं जलती। ऑक्सीजन गैस की प्रकृति अनुचुम्बकीय है।

किन्तु लिक्विड ऑक्सीजन मैग्नेटिक होती है. मतलब, एक पावरफुल चुंबक के साथ यह चारों तरफ घुमाई जा सकती है. यहाँ तक कि एक जगह से उठाई भी जा सकती है.।

आक्सीजन के रासायनिक गुण-

हवा से ऑक्सीजन अलग करने के लिए अब द्रव हवा का अत्यधिक उपयोग होता है, जिसके प्रभाजित आसवन से ऑक्सीजन प्राप्त किया जाता है,

पानी के इलेक्ट्रॉलिसिस से हाइड्रोजन के उत्पादन में ऑक्सीजन भी बाइप्रॉडक्ट के रूप में मिलता है
ऑक्सीजन प्राप्त करने के विचार से कुछ अन्य ऑक्साइड भी जैसे ताँबा, पारा आदि के ऑक्साइड इसी प्रकार उपयोगी हैं
.
बहुत से तत्व ऑक्सीजन से सीधा संयोग करते हैं। इनमें कुछ जैसे फॉस्फोरस, सोडियम इत्यादि तो साधारण ताप पर ही धीरे-धीरे क्रिया करते हैं, परंतु अधिकतर, जैसे कार्बन, गंधक, लोहा, मैग्नीशियम इत्यादि, गरम करने पर ऑक्सीजन से भरे बर्तन में ये वस्तुएँ दहकती हुई अवस्था में डालते ही जल उठती हैं और जलने से ऑक्साइड बनता है। ऑक्सीजन में हाइड्रोजन गैस जलती है तथा पानी बनता है। यह क्रिया इन दोनों के गैसीय मिश्रण में विद्युत चिनगारी से अथवा उत्प्रेरक की उपस्थिति में भी होती है।

जब बेरियम ऑक्साइड को गर्म किया जाता है लगभग 500° सेंटीग्रेड तक तब वह हवा से ऑक्सीजन लेकर परॉक्साइड बनाता है। अधिक तापक्रम लगभग 800° सेंटीग्रेड पर इसके विघटन से ऑक्सीजन प्राप्त होता है तथा पुन: उपयोग के लिए बेरियम ऑक्साइड बचा रहता है। औद्योगिक उत्पादन के लिए ब्रिन विधि इसी क्रिया पर आधारित थी।

आक्सीजन एवं जीव -

(1) हमारे शरीर की 90% एनर्जी ऑक्सीज़न की वजह से आती है. भोजन, पानी से तो केवल 10% मिलती है.।

(2) नाइट्रोज़न की तुलना में ऑक्सीज़न
पानी में 2 गुणा ज्यादा घुलनशील है. इसी से जलीय जीवन सम्भव हुआ है अगर ये नाइट्रोजन जितनी ही घुलनशील होती तो जल में जन्तुओ का जीवन सम्भव नही हो पाता।

(3) आदमी के खून में ऑक्सीजन का स्तर 12 से 14 किलोपास्कल तक रहता है।

आक्सीजन की कमी से होने वाले रोग -

सामान्य तौर पर शरीर में ऑक्सीजन का स्तर 95 से 100 प्रतिशत तक होता है। जब शरीर में ऑक्सीजन का स्तर 90% से नीचे जाता है तो उसे ऑक्सीजन की कमी माना जाता है।

आक्सीजन की कमी से मुख्यता: हाइपोजिमिया रोग होता है ।
यदि शरीर के विभिन्न अंगों जैसे, मस्तिष्क, लिवर और किड़नी समेत अनेकों अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिले तो यह भी डेमेज हो सकते हैं।

तथा मिर्गी, लकवा , कैंसर आदि रोगों के लिए भी आक्सीजन की कमी जिम्मेदार होती है।

ऑक्सीजन की कमी से शरीर अम्लीय हो जाता है।
कैंसर की कोशिकाएं (Cells) अवायवीय अर्थात ऑक्सीजन के बिना जीवित रहने वाली ) होती है जिस शरीर में ऑक्सीजन अधिक होगी वहां कैंसर की कोशिकाए जीवित नहीं रह सकती।

आक्सीजन की प्राकृतिक रूप से प्राप्ति -

(1) जमीन का अधिकांश हिस्सा समुद्री होने की वजह से समुद्री पौधे पृथ्वी को सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं।  वातावरण में मौजूद 70 से 80 फीसदी ऑक्सीजन समुद्री पौधे की द्वारा ही बनाई जाती है। ये पौधे जमीनी पौधों से ज्यादा ऑक्सीजन बनाते हैं।

(2)  बांस , नीम, बरगद, तुलसी ,पीपल के पेड़ की तरह नीम, बरगद और तुलसी के पेड़ भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देते हैं। नीम, बरगद, तुलसी के पेड़ एक दिन में 20 घंटों से ज्यादा समय तक ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं। जबकि पीपल 22 घंटे से भी ज्यादा ।
-

Wednesday, September 20, 2017

विटामिन एवं उनके रासायनिक नाम

विटामिन की खोज एक डच जीवाणु विशेषज्ञ, क्रिश्चियान एइकमैन (1858-1930) द्वारा अचानक ही हो गई थी। उन्होंने सबसे पहले ध्यान दिया कि जो मुर्गियां चावल के दाने खाती थीं वे बीमार पड़ गईं।

उन्होंने यह कारण खोज निकाला कि अनाज की ऊपरी सतह को यदि हटा दिया जाए तो उसमें मौजूद रसायन भी निकल जाते हैं जिसे हम विटामिन कहते हैं।
जब एइकमैन 1886 में इंडोनेशिया दौरे पर ‘बेरी-बेरी’ नामक महामारी की पड़ताल करने गए तो उनके दावों को और अधिक सच माना गया। बाद में वह यह साबित करने में सक्षम रहे कि ‘बेरी-बेरी’ का रोग डाइट की कमी से होता है। इससे विटामिन्स की खोज हुई और यह बात सामने आई कि विटामिन सेहत के लिए बहुत जरूरी है।

एइकमैन, हालांकि पूरी तरह से विटामिन्स के बारे में नहीं समझ पाए। बाद में फैडरिक हॉपकिन जो ब्रिटिश वैज्ञानिक थे, ने इस सिद्धांत को समझा कि मानव शरीर को कुछ मात्रा में ऐसे रसायनों की आवश्यकता है जो उन्हें सेहतमंद रख सकें।

उन्होंने यह कहा कि रिकेट्स या स्कर्वी जैसे रोगों से बचा जा सकता है यदि भोजन में या किसी दूसरी चीज में जरूरी रसायन यानी कि विटामिन्स लिए जाएं। ऐसा बिल्कुल सही माना ग

या और विटामिन्स के प्रकारों को नाम भी दिए गए।
वास्तव में विटामिन्स के कई स्रोत तथा उपयोग हैं जैसे विटामिन ‘ए’, मक्खन, दूध, अंडे, हरी सब्जियों और मछली में पाया जाता है जो बीमारियों से लडऩे में सहायक होते हैं। विटामिन ‘बी’ भूख बढ़ाता है। यह तंत्रिकाओं तथा त्वचा में शक्ति बढ़ाता है। यह यीस्ट, मीट तथा अलग-अलग अनाजों में पाया जाता है। विटामिन ‘सी’ खून साफ करने में सहायक है तथा जुकाम से सुरक्षा प्रदान करता है। यह मुख्य तौर पर फल जैसे संतरे तथा नींबू आदि में पाया जाता है।
हड्डियों की मजबूती के लिए विटामिन ‘डी’ की आवश्यकता होती है जो कॉड मछली के तेल तथा अंडे की जर्दी आदि में पाया जाता है। विटामिन ‘ई’ मोटे अनाजों और अन्य प्रकार के भोजन में पाया जाता है। विटामिन ‘के’ खून के बहाव को रोकने और क्लॉट के लिए विशेष रूप से जरूरी है। अत: चोट लगने पर खून के रिसाव को रोकने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। यह बहुत सी चीजों में मौजूद होता है जैसे लिवर तथा हरी सब्जियों इत्यादि में।

ऊपर दिए गए तथ्यों से हमें पता चलता है कि विटामिन्स हमारी सेहत के लिए बहुत जरूरी हैं। इस महत्वपूर्ण खोज के लिए क्रिश्चियान एइकमैन और फैडरिक हॉपकिन को 1929 में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था।

विटामिन जटिल कार्बनिक पदार्थ होते हैं तथा शरीर की उपापचयी क्रियाओं में भाग लेते हैं। इन्हें वृद्धिकारक भी कहते हैं। इनकी कमी से अपूर्णता रोग हो जाते हैं। ये कार्बन ,
हाइड्रोजन , ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा
गन्धक आदि तत्वों से बने सक्रिय एवं जटिल कार्बनिक यौगिक हैं। ये अल्पांश में हमारे शरीर को स्वस्थ एवं निरोग रखने के लिए आवश्यक होते हैं। इनकी कमी से अनेक रोग हो जाते हैं।

इन्हें दो वर्गों में विभक्त किया जाता है-

(1)  जल में घुलनशील विटामिन, जैसे- विटामिन 'B', 'C'।

(2) वसा में घुलनशील विटामिन, जैसे-
विटामिन 'A' , ' D ', 'K' आदि।

विटामिन की खोज एफ.जी. हाफकिन्स ने की थी, परन्तु इसे विटामिन का नाम फुन्क महोदय ने दिया।प्रश्नों में बिटामिन का खोज कर्ता फुन्क को ही माना जाता है । इसने विटामिन की खोज 1911 में की थी।

विटामिन का निर्माण अलग अलग अंगो में होता है

विटामिन कार्बनिक यौगिक है, जो शरीर के विकास एवं रोगों से रक्षा के लिए आवश्यक है। ये ऊतकों में एन्जाइम का निर्माण करते है। विटामिन "डी" हमारे शरीर में स्वतः बनता है

जबकि विटामिन "के" आंत्र में उपस्थित ‘कोलोन’ नामक वैक्टीरिया बनाता है।

                 विटामिन         -    रासायनिक नाम

(1) विटामिन A            -  रेटिनॉल

(2) विटामिन B1         -   थायमिन

(3) विटामिन B2        - राइबोफ्लेविन

(4) विटामिन B3         -   पैन्टोथेनिक अम्ल

(5) विटामिन B5         -   नियासिन/ निकोटिनैमाइड

(6) विटामिन B6        -   पाइरीडॉक्सिन

(7) विटामिन बी7       -   बायोटीन

(8) विटामिन  B12      -  सायनोकाबालामिन

(9) फ़ोलिक अम्ल      -    टेरोइल ग्लूटैमिक

(10) विटामिन C      -   एस्कार्बिक अम्ल

(11) विटामिन D       -  कैल्सिफेराल

(12) विटामिन E        -  टोकोफेरोल

(13) विटामिन K        -  फिलोक्विनोन

Tuesday, September 19, 2017

कार्य

हम समन्यता: जो भी करते है उसे कार्य बोलते है । घंटो इन्टरनेट पर काम करते है उसे भी कार्य बोलते है किन्तु भौतिकी के अनुसार इन्टरनेट पर घंटो बैठने को कार्य नही बोलते है ,भौतिकी में कार्य होना तभी माना जाता है जबकि वस्तु पर बल लगाने पर उसमें विस्थापन हो,उसे कार्य कहते हैं। कार्य सम्पन्न होने के लिए दो बातें आवश्यक हैं–

(1) बल (2) विस्थापन

कार्य के मात्रक:-
(1) SI पद्धति में कार्य का मात्रक जूल(joule) है।
समीकरण (1) में यदि,

F=1 न्यूटन तथा d = 1 मीटर हो ,तो
W = 1 न्यूटन × 1 मीटर

= 1 न्यूटन- मीटर
=1 जूल

अतः यदि किसी वस्तु पर 1 न्यूटन का बल लगाने पर बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन 1 मीटर हो तो किया गया कार्य 1 जूल कहलाता है।

धनात्मक कार्य

जब बल और विस्थापन की दिशा एकसमान होती है अथवा बल और विस्थापन के बीच का कोण न्यून कोण होता है तो बल द्वारा किया गया कार्य धनात्मक होता है।
उदाहरण:-
(1) किसी व्यक्ति द्वारा किसी कुएँ में से एक बाल्टी को रस्सी द्वारा, जो बाल्टी से बँधी है, बाहर निकालने में किया गया कार्य क्योंकि बल और विस्थापन की दिशा समान होती है।

(2) जब एक घोड़ा गाड़ी को खींचता है तो किया गया कार्य धनात्मक होता है।’

ऋणात्मक कार्य

जब बल और विस्थापन की दिशा विपरीत होती है अथवा उनके मध्य का कोण अधिक कोण होता है तो किया गया कार्य ऋणात्मक कार्य कहलाता है।
उदाहरण:-
(1) किसी व्यक्ति द्वारा किसी कुएँ में से एक बाल्टी को रस्सी द्वारा, जो बाल्टी से बँधी है, बाहर निकालने में किया गया कार्य धनात्मक होता है किन्तु गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होता है, क्योंकि गुरुत्वीय बल और विस्थापन की दिशाएँ विपरीत हैं।
(2) दोलन कर रहे किसी लोलक को विरामावस्था में लाने के लिए वायु के प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होता है।’

शून्य कार्य

यदि बल वस्तु की गति के लंबवत् हो या बल लगाये जाने पर भी वस्तु का विस्थापन शून्य हो तो बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है।

उदाहरण:-(1) यदि एक कुली अपने सिर पर सूटकेस रखकर प्लेटफार्म पर क्षैतिज गति करता है या खड़ा रहता है तो उसके द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है।

(2) जब कोई वस्तु एकसमान वृत्तीय गति करती है
तो उस पर केन्द्र की दिशा में अभिकेन्द्र बल कार्य करता है। यह बल वस्तु की गति के लंबवत् होता है। अतः अभिकेन्द्र बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है।’

  W = F.d cosθ

Monday, September 18, 2017

मापक यंत्र

1.Altimeter – यह ऊँचाई मापक यंत्र है ! जिसका प्रयोग विमानों में किया जाता है !

2.Anemometer – इससे वायु का बल, गति को मापा जा सकता है ! यह वायु की दिशा परिवर्तन भी करता है !

3.Audiometer – इससे ध्वनि की तीव्रता को मापा जा सकता है !

4.Audiophone – इसे सुनने की मशीन कहा जाता है इसे लोग सुनने में सहायता के लिए कानों में लगाते है !

5.Actimometer – विद्युत चुम्बकीय विकिरण (Magnetic Radiation) तीव्रता मापने का यंत्र है !

6.Aerometer – यह वायु और गैसों के घनत्व को मापने वाला यंत्र है !

7.Astrometer – तारों की प्रकाश की तीव्रता को मापने वाला यंत्र कहते है !

8.Antiaircraft Gun – गोला मारकर हवाई जहाज गिराने की तोप है !

9.Accelerometer– वाहन के त्वरण को मापने वाला यंत्र है !

10.Barograph– यह वायुमण्डल के दाब में होने वाले परिवर्तन को लगातार मापता रहता है और स्वतः ही इसका ग्राफ भी बता देता है !

11.Binoculars– इससे दूर स्थित वस्तुयें स्पष्ट देखी जा सकती है !

12.Bolometer– यह ऊष्मीय विकिरण (Heat Radiation) को मापने का यंत्र है !

13.Callipers– इससे वृत्ताकार वस्तुओं के भीतरी तथा बाहरी ब्यास को मापा जा सकता है। इससे मोटाई भी मापी जा सकती है !

14.Calorimeter– इससे ऊष्मा की मात्रा को मापा जा सकता है !

15.Cardiograph – हृदय गति को मापने में इसका प्रयोग होता है !

16.Compass needle– यह दिशा सूचक यंत्र है ! इसके द्वारा किसी स्थान पर दिशाओं का पता पड़ जाता है !

17.Chronometer– यह यंत्र जलयानों पर सही समय मापने में उपयोग किया जाता है !

18.Cesco graph– पेड़ पौधों की वृद्धि मापने का यंत्र है !

19.Carburetor– इसमें अन्र्तग्रहण पेट्रोल इंजनों में पेट्रोल तथा हवा का मिश्रण बनाया जाता है !

20.Cymograph– रूधिर दाब के ग्राफ कों बनाने का यंत्र है !

21.Cytotron– कृत्रिम मौसम उत्पन्न करने में काम आने वाला यंत्र है !

22.Cytoscope– इसका प्रयोग मूत्राशय के आंतरिक भागों को सीधे ही देखने में किया जाता है !

23.Dynamo– इसका प्रयोग यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने में होता है !

24.Dynamometer– विद्युत शक्ति को मापने के लिए इस यंत्र का प्रयोग किया जाता है !

25.Dictaphone– अपनी बात तथा आदेश दूसरे व्यक्ति को सुनाने के लिए इस यंत्र द्वारा ‘‘रिकार्ड’’ किया जाता है !

26.Dilatometer– यह यंत्र किसी वस्तु में उत्पन्न आयतन के परिवर्तन को मापता है !

27.Electric meter– विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक में बदलने वाला यंत्र है !

28.Electrometer– विद्युत आवेश की उपस्थिति तथा उसकी प्रकृति का पता लगाने में इस यंत्र का प्रयोग किया जाता है !

29.Eudiometer– इसके द्वारा गैसों में रासायनिक क्रिया के कारण आयतन में होने वाले परिवर्तनों को नापा जा सकता है !

30.E.G (Electro Encephalo Graph)– यह यंत्र मस्तिष्क की तरंगों को रिकार्ड करता है तथा उनकी व्याख्या भी करता है !

31.Endoscope– यह वह यंत्र है जिसे शरीर के अंदर प्रवेश कराके अंदर की संरचना व विकारों को देखा जा सकता है !

32.Flux meter– इस यंत्र के द्वारा चुम्बकीय फ्लेक्स को मापा जा सकता है !

33.Galvanometer– विद्युत परिपथों में विद्युत धारा की दिशा बताने बाला एवं उसकी तीव्रता मापने वाला यंत्र है !

34.Gravimeter– पानी की सतह पर तेल की उपस्थिति ज्ञात करने में इस यंत्र का प्रयोग होता है !

35.Geiger-Muller-counter– इससे किसी रेडियो एक्टिव स्त्रोत से निकलने वाले विकिरणों को मापा जाता है ! इसे केवल गाइगर काउन्टर भी कहते है !

36.Gramophone– इसके द्वारा रिकार्ड पर अंकित संकेत सुनने के लिये उपयोग में लाया जाता है !

37.Gyroscope– घूमती हुई वस्तुओं की गति मापने के लिये इस यंत्र का प्रयोग किया जाता है !

38.Gyrograph– घूमते हुये पहिये के चक्कर गिनने में इसका प्रयोग होता है !

39.Hydrometer– द्रवों के आपेक्षित घनत्व ज्ञात करने में इस यंत्र का प्रयोग किया जाता है !

40.Hygrometer– वायुमण्डल की आर्द्रता को मापने के लिये इस यंत्र का प्रयोग किया जाता है !

41.Hydrophone– पानी के अंदर तरंगों को संसूचित (Detect) करने वाला यंत्र है !

42.Hygroscope– यह वायुमण्डलीय आर्द्रता में परिवर्तन दिखाने वाला यंत्र है !

43.Hypsometer– यह द्रवों के क्वथनांक (Boiling Point) ज्ञात करने वाला यंत्र है !

44.Konimeter– वायु में उपस्थित धूल की मात्रा को मापा जा सकता है !

45.Kymograph– यह यंत्र रक्तचाप (Blood Pressure), हृदय स्पंदन (Heart Beat) आदि शारीरिक गतियों या कारकों के परिवर्तन का ग्राफ बनाता है !

46.Lactometer– यह दूध की शुद्धता को मापने वाला एक यंत्र है। इससे दूध का आपेक्षित घनत्व मापा जाता है जिससे दूध में उपस्थित पानी की मात्रा का पता चल जाता है !

47.Manometer– इसके द्वारा गैस या द्रव का दाव मापा जाता है !

48.Magnetron– विशेष प्रकार की ट्यूब जो बहुत छोटी तरंग-दैध्र्य (Wave Length) वाली सूक्ष्म तरंगें (Micro Wave) को मापा जाता है।

भौतिक राशियाँ

भौतिक राशियाँ,

भौतिक राशियाँ : भौतिकी के नियमों को जिन राशियों के पदों में व्यक्त किया जाता है, उन्हें भौतिक राशियाँ कहते हैं| जैसे—वस्तु का द्रव्यमान, लम्बाई, बल, चाल, दूरी, विद्युत् धारा, घनत्व आदि|

भौतिक राशियों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है:

(1) अदिश (Scalar) राशियाँ

(2) सदिश (vector) राशियाँ

(1) अदिश (Scalar) राशियाँ: वैसी भौतिक राशियाँ जिनमें केवल परिमाण (magnitude) होता है, दिशा (direction) नहीं होती है, उन्हें अदिश राशि कहते हैं| जैसे- द्रव्यमान, घनत्व, तापमान, विद्युत् धारा, समय, चाल, आयतन, कार्य आदि|

(2) सदिश (vector) राशियाँ: वैसी भौतिक राशियाँ जिनमें परिमाण के साथ-साथ दिशा भी होती है और जो योग के निश्चित नियमों के अनुसार जोड़ी जाती हैं, उन्हें सदिश राशि कहते हैं| जैसे- वेग, विस्थापन, बल, संवेग, त्वरण, बल आघूर्ण, विद्युत् तीव्रता आदि|

माप के मात्रक/इकाई (Unites of Measurement): किसी भी राशि की माप करने के लिए उसी राशि के एक परिमाण को मानक मान लिया जाता है और उसे कोई नाम दे दिया जाता है| इसी को उस राशि का मात्रक कहते हैं|

किसी दी हुई राशि की उसके मात्रक से तुलना करने की क्रिया को मापन कहते हैं|

मात्रक दो प्रकार के होते हैं- (i) मूल मात्रक (ii) व्युत्पन्न मात्रक |

(i) मूल मात्रक/इकाई (Fundamental Units): किसी भौतिक राशि को व्यक्त करने के लिए कुछ ऐसे मानकों का प्रयोग किया जाता है, जो अन्य मानकों से स्वतंत्र होते हैं, इन्हें मूल मात्रक कहते हैं| जैसे- लम्बाई, समय और द्रव्यमान के मात्रक क्रमशः मीटर, सेकेण्ड एवं किलोग्राम मूल मात्रक हैं|

(ii) व्युत्पन्न मात्रक/इकाई (Derived Units): किसी भौतिक राशि को जब दो या दो से अधिक मूल इकाईयों में व्यक्त किया जाता है, तो उसे व्युत्पन्न इकाई कहते हैं| जैसे- बल, दाब, कार्य एवं विभव के लिए क्रमशः न्यूटन, पास्कल, जूल एवं वोल्ट व्युत्पन्न मात्रक हैं|

मात्रक पद्धतियां (System of Unites) भौतिक राशियों के मापन के लिए निम्नलिखित चार पद्धतियां प्रचलित हैं-

(i) CGS पद्धति (Centimetre Gram Second System): इस पद्धति में लम्बाई, द्रव्यमान तथा समय का मात्रक क्रमशः सेंटीमीटर, ग्राम और सेकेण्ड होता है| इसलिए इसे Centimetre Gram Second या CGS पद्धति कहते हैं| इसे फ्रेंच या मीट्रिक पद्धति भी कहते हैं|

(ii) FPS पद्धति (Foot, Pound, Second System): इस पद्धति में लम्बाई, द्रव्यमान तथा समय का मात्रक क्रमशः फुट, पाउण्ड और सेकेण्ड होता है| इसे ब्रिटिश पद्धति भी कहते हैं|

(iii) MKS पद्धति (Metre Kilogram Second System): इस पद्धति में लम्बाई, द्रव्यमान तथा समय का मात्रक क्रमशः मीटर, किलोग्राम और सेकेण्ड होता है|

(IV) अंतर्राष्ट्रीय मात्रक पद्धति (International System of Units or S.I. Units): 1960 ई. में अंतर्राष्ट्रीय माप-तौल के अधिवेशन में SI को स्वीकार किया गया जिसका पूरा नाम de Systeme International d’ Units है| इस पद्धति में सात मूल मात्रक तथा दो सम्पूरक मात्रक हैं|

SI के सात मूल मात्रक निम्न हैं:

1. लम्बाई का मूल मात्रक ‘मीटर’: SI unit में लम्बाई का मूल मात्रक मीटर है| 1 मीटर वह दूरी है, जिसे प्रकाश निर्वात में 1/299792458 सेकेण्ड में तय करता है|

2. द्रव्यमान का मूल मात्रक ‘किलोग्राम’: फ्रांस के सेवरिस नामक स्थान पर माप-तौल के अंतर्राष्ट्रीय माप तौल ब्यूरो में सुरक्षित रखे प्लेटिनम-इरीडियम मिश्रधातु के बने हुए बेलन के द्रव्यमान को मानक किलोग्राम कहते हैं| इसे संकेत में किग्रा. (Kg) लिखते हैं|

3. समय का मूल मात्रक ‘सेकेण्ड’: सीजियम-133 परमाणु की मूल अवस्था के दो निश्चित ऊर्जा स्तरों के बीच संक्रमण से उत्पन्न विकिरण के 9192631770 आवर्तकालों की अवधि को 1 सेकेण्ड कहते हैं|

4. विद्युत्-धारा का मूल मात्रक ‘ऐम्पियर’: यदि दो लम्बे और पतले तारों को निर्वात में 1 मीटर की दूरी पर एक-दूसरे के सामानांतर रखा जाए और उनमें ऐसे परिमाण की सामान विद्युत् धारा प्रवाहित की जाए जिससे तारों के बीच प्रति मीटर लम्बाई में 2 x 10-7 न्यूटन का बल लगने लगे तो विद्युत् धारा के उस परिमाण को 1 ऐम्पियर कहा जाता है| इसका प्रतीक A है|

5. ताप का मूल मात्रक ‘केल्विन’: जल के त्रिक बिंदु (triple point) के उष्मागतिक ताप के 1/273.16 वें भाग को केल्विन कहते हैं| इसका प्रतीक K होता है|

6. ज्योति-तीव्रता का मूल मात्रक ‘कैण्डेला’: किसी निश्चित दिशा में किसी प्रकाश स्रोत की ज्योति-तीव्रता 1 कैण्डेला तब कही जाती है, जब यह स्रोत उस दिशा में 540 x 1012 हर्ट्ज़ का तथा 1/ 683 वाट/स्टेरेडियन तीव्रता का एकवर्णीय प्रकाश उत्सर्जित करता है|

7. पदार्थ की मात्रा का मूल मात्रक ‘मोल’: एक मोल, पदार्थ की वह मात्रा है, जिसमें उसके अवयवी तत्वों (परमाणु, अणु,....... आदि) की संख्या 6.023 x 1023 होती है| इस संख्या को ऐवोगाड्रो नियतांक कहते हैं|

SI के दो सम्पूरक मात्रक निम्न हैं:

1. रेडियन: किसी वृत्त की त्रिज्या के बराबर लम्बाई के चाप द्वारा उसके केंद्र पर बनाया गया कोण एक रेडियन होता है| इस मात्रक का प्रयोग समतल पर बने कोणों (plane angles) को मापने के लिए किया जाता है|

2. स्टेरेडियन: किसी गोले की सतह पर उसकी त्रिज्या के बराबर भुजा वाले वर्गाकार क्षेत्रफल द्वारा गोले के केंद्र पर बनाए गए घन कोण को 1 स्टेरेडियन कहते हैं| यह ठोस कोणों (solid angles) को मापने का मात्रक है|

राशि              मात्रक का मान          संकेत
—             ———          —-
मूल मात्रक
(1)लम्बाई               मीटर                    m

(2)द्रव्यमान            किलोग्राम                kg

(3)समय                सेकण्ड                   s

(4)ताप                  केल्विन                  K

(5)विद्युतधारा          ऐम्पियर                 A

(6)ज्योति-तीव्रता      कैन्डेला                 cd

(7)पदार्थ की मात्रा      मोल                   mol

पूरक मूल मात्रक

राशि                   मात्रक का मान          संकेत

(1)समतल कोण        रेडियन                 rad

(2)घन कोण             स्टेरेडियन              sr’

कुछ प्रमुख व्युत्पन्न मात्रक

भौतिक राशि               SI मात्रक

क्षेत्रफल                          m2

आयतन                          m3

घनत्व                            Kg/m3

चाल                              m/s

वेग                                m/s

त्वरण                             m/s2

बल                                Kgm/s2 = N

संवेग                              Kgm/s

आवेग                             N.s

दाब                                N/m2

कार्य या ऊर्जा                   Nm = Joule

शक्ति                               J/s = Watt

कुछ अन्य महत्वपूर्ण मात्रक:

अत्यधिक लम्बी दूरियों को मापने में प्रयोग किये जानेवाले मात्रक-

1. खगोलीय इकाई (Astronomical Unit- A.U.): सूर्य और पृथ्वी के बीच की माध्य दूरी ‘खगोलीय इकाई’ कहलाती है|

1 A.U. = 1.495 x 1011मीटर

2. प्रकाश वर्ष (Light Year): एक प्रकाश वर्ष निर्वात में प्रकाश द्वारा एक वर्ष में चली गयी दूरी है|

1 ly = 9.46 x 1015 मीटर

3. पारसेक : यह दूरी मापने की सबसे बड़ी इकाई है|

1 पारसेक  = 3.08 x 1016 मीटर

लम्बाई/दूरी के मात्रक

1 किलोमीटर   = 1000 मीटर

1 मील           = 1.60934 किलोमीटर

1 नाविक मील   =  1.852 किलोमीटर

1 खगोलीय इकाई   =  1.495 x 1011 मीटर

1 प्रकाश वर्ष         =  9.46 x 1015 मीटर =48612 A.U

1 पारसेक          =  3.08 x 1016 मीटर = 3.26 ly

द्रव्यमान के मात्रक

1 औंस     = 28.35 ग्राम

1 पाउण्ड   = 16 औंस = 453.52 ग्राम

1 किलोग्राम   = 2.205 पाउण्ड = 1000 ग्राम

1 क्विंटल      = 100 किलोग्राम

1 मीट्रिक टन    = 1000 किलोग्राम

समय के मात्रक

1 मिनट     = 60 सेकेण्ड

1 घंटा       =  60 मिनट = 3600 सेकेण्ड

1 दिन        =  24 घंटे

1 सप्ताह     = 7 दिन

1 चन्द्र मास   =  4 सप्ताह = 28 दिन

1 सौर मास    =  30 या 31 दिन (फरवरी 28 या 29 दिन)

1 वर्ष           =  13 चन्द्र मास 1 दिन = 12 सौर मास = 365  दिन

1 लीप वर्ष      =  366 दिन

क्षेत्रफल के मात्रक

1 एकड़
=  4840 वर्ग गज 
= 43560 वर्ग फुट        
= 4046.94 वर्ग मीटर

1 हेक्टेयर
= 2.5 एकड़

1 वर्ग किलोमीटर   = 100 हेक्टेयर

1 वर्ग मील
= 2.6 वर्ग किलोमीटर
= 256 हेक्टेयर
= 640 एकड़

आयतन के मात्रक

1 लीटर
= 1000 घन सेंटीमीटर 
= 0.2642 गैलन

1 गैलन
=  3.785 लीटर