Friday, October 27, 2017

दृष्टि दोष कारण एवं समाधान

आंखों में अपवर्तन दोष के कारण दृष्टि धुंधली हो जाती हैं ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति वस्तु को आराम से सूस्पष्ट देख नहीं पाता है ।

प्रमुख रूप से दृष्टि के तीन सामान्य अपवर्तक दोष होते हैं ।
(1) निकट दृष्टि दोष

(2) दूर दृष्टिदोष

(3) जरा दूरदृष्टिता

दृष्टि दोष होने का कारण-

समंजन क्षमता-

हमारा लेंस रेशेदार जेली जैसे पदार्थो से बना है जो ऊपर और नीचे पक्ष्माभी पेशियों से जुडी होती है ।
जब हम पास की वस्तुओ को देखते है तो ये पेशियाँ सिकुड़ जाती है जिससे लेंस की वक्रता बढ़ जाती है । अब लेंस मोटा हो जाता है ,और प्रतिविम्ब रेटीना पर बनता है।

इसके विपरीत जब हम दूर की वस्तु को देखते है तो पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल पड जाती है और लेंस पतला हो जाता है। और प्रतिविम्ब रेटिना पर बनता है ।

इस प्रकार लेंस की उस क्षमता को समंजन कहते है जिसके द्वारा आँख फोकस दूरी को समायोजित कर के दूर व् पास दोनों वस्तुओ का प्रतिविम्ब रेटिना पर बनाती है।

किसी वस्तु को देखने के लिए प्रतिविम्ब का रेटिना पर बनना आवश्यक है।

हमारी आँखे एक  निश्चित सीमा से अधिक लेंस को मोटा नही कर सकती है । अत: अगर हम किसी वस्तु को बहुत पास से देखे तो उसकी फोकस दुरी रेटिना की दूरी से अधिक हो जाती है । और प्रतिविम्ब रेटिना के पीछे बनता है। हमे वस्तु धुंधला दिखाई देता है।

25 cm से अनंत दूरी तक का प्रतिविम्ब रेटिना पर बनाने में एक स्वस्थ प्क्षमाभी पेशी सक्षम होती है।

जब पक्ष्माभी पेशी ठीक प्रकार से काम नही करती है तो दृष्टी दोष हो जाते है।

(1) दूर दृष्टी दोष- इस दृष्टी दोष में व्यक्ति को दूर की वस्तुये स्पष्ट दिखाई देती है किन्तु पास की वस्तुए धुंधली दिखती है।

इसमें पास की वस्तुए देखने पर पक्ष्माभी पेशियों में खिचाव नही आता जिससे प्रतिविम्ब रेटिना के पीछे बनने लगता है और वस्तुए धुंधली दिखती है।

इस दृष्टी दोष को दूर करने के उत्तल लेंस का प्रयोग करते है जिससे फोकस दूरी कम होकर प्रतिविम्ब रेटिना पर बनने लगता है।

(2) निकट दृष्टि दोष - इस दोष में पास की वस्तुए साफ़ दिखाई देती है जबकि दूर की वस्तुए धुंधली दिखाई देती है।

इस दोष में प्रतिविम्ब रेटिना के पहले ही बनने लगता है । अवतल लेंस का प्रयोग कर हम फोकस दूरी को बढ़ा देते है जिससे प्रतिविम्ब रेटिना पर बनने लगता है।

(3) जरा दूरदृष्टी दोष - इसमें व्यक्ति को दूर व् पास दोनों की वस्तुए धुंधली दिखाई देती है।

यह समस्या आयु अधिक होने पर होती है इस दोष में पक्ष्माभी पेशियों में शिथिल होने एवं सिकुड़ने दोनो ही गुण खत्म हो जाते है।

इस दोस को द्विफोकसी लेंस का प्रयोग कर के दूर करते है ।

द्विफोकसी लेंस - इन लेंसो में ऊपर का भाग अवतल लेंस तथा नीचे उत्तल लेंस लगा होता है।

Wednesday, October 4, 2017

फंफूद और हैल्मिन्थ्स से होने वाले रोग

हैल्मिन्थस से होने वाले रोग -

(1) अतिसार - इस रोग का कारण आंत में मौजूद एस्केरिस लुम्ब्रीकाइड़ीज नामक अंतः परजीवी प्रोटोजोआ (निमेटोड ) है जो घरेलू मक्खी द्वारा प्रसारित होता है इससे आंत  में घाव हो जाता है जिसमें प्रोटीन पचाने वाला एंजाइम ट्रिपसिन नष्ट हो जाता है यह रोग बच्चों में अधिक पाया जाता है ।

(2) फाइलेरिया - यह रोग फाइलेरिया बैन्क्रोफ्टाई  नामक कृमि  से होता है इस कृमि का संचारण क्यूलेक्स मच्छरों के दंस से होता है इस रोग में पैरों वृष्णकोषों तथा शरीर के अन्य भागों में सूजन हो जाती है इस रोग को हाथी पाव भी कहते हैं।

फफूंद से होने वाले रोग -

(1) दमा - मनुष्य के फेफड़ों में एस्पर्जिलस  फ्यूमिगेटस नामक कवक के स्पोर पहुंच कर वहां जाल बनाकर फेफड़ों का काम अवरुद्ध कर देते हैं यह एक संक्रामक रोग है ।

(2) एथलीट फुट -  यह  रोग टीनिया पेडिस नामक कवक से होता है यह त्वचा का संक्रामक रोग है जो पैरों की त्वचा के फटने कटने और मोटे होने से होता है।

(3) खाज  - यह रोग एकेरस स्केबीज  नामक कवक  से होता है जिससे त्वचा में खुजली होती है और सफेद दाग पड़ जाते है ।

(4) गंजापन - यह टीनिया केपिटिस नामक  कवक से होता है इससे सिर के बाल गिर जाते हैं ।

(5) दाद-  यह रोग  ट्राईकोफायटन लेरुकोसम नामक कवक से फैलता है यह संक्रामक रोग है इससे त्वचा पर लाल रंग की गोली पड़ जाते हैं।

प्रमुख चिकित्सा उपकरण

(1) पेसमेकर - हृदय की गति कम हो जाने पर उसे सामान्य अवस्था में लाने हेतु इसका प्रयोग किया जाता है।

(2) कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन (सीटी स्कैन) - संपूर्ण शरीर में किसी असामान्य विकृति का पता लगाने हेतु इसका प्रयोग किया जाता है ।

(3) इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ - हृदय संबंधी असमान्यताओं का पता लगाने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है ।

(4) ऑटो एनालाइजर - ग्लुकोज, यूरिया एवम कैस्ट्रॉल इत्यादि की जांच के लिए इसका प्रयोग किया जाता है ।

(5) इलेक्ट्रो इन्सेफैलोग्राफ - मस्तिष्क की विकृतियों का पता लगाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

Tuesday, October 3, 2017

कुछ प्रमुख रोग

(1) पक्षाघात या लकवा - इस रोग  में कुछ ही मिनटों में शरीर के आधे भाग को लकवा मार जाता है जहां पक्षाघात होता है वहां की तंत्रिकाएं निष्क्रिय हो जाती है इसका कारण अधिक रक्त दाब के कारण मस्तिष्क की कोई धमनी का फट जाना या मस्तिष्क को अपर्याप्त रक्त की आपूर्ति होना है ।

(2) एलर्जी - कुछ वस्तुओं जैसे धूल, धुआं ,रसायन कपड़ा, सर्दी , आदि विशेष व्यक्तियों के लिए हानिकारक हो जाते हैं और उनके शरीर में विपरीत क्रिया होने लगती है जिससे अनेक बीमारियां हो जाती है जैसे खुजली या फोड़ा ,फुंसी शरीर में सूजन आ जाना, काला दाग ,एग्जिमा आदि एलर्जी के उदाहरण है।

(3) साइजोफ्रेनिया - यह मानसिक रोग है जो प्रायः युवा वर्ग में होता है ऐसा रोगी कल्पना को ही सत्य मानता है और वास्तविकता को नहीं।

ऐसे रोगी आलसी , अलगावहीन ,आवेशहीन होते हैं विद्युत आवेश चिकित्सा इसमें काफी सहायक होती है।

(4) मिर्गी - इसे अपस्मार रोग कहते हैं यह मस्तिष्क की आंतरिक रोगों के कारण होती है इस रोग में जब दौरा पड़ता है तो मुंह से झाग निकलने लगता है और मल पेशाब भी निकलता है ।

(5) डिपलोपिया - यह रोग आँखों  की मांसपेशियों की पक्षाघात के कारण होती है ।

(6) कैंसर - मनुष्य के शरीर के किसी भी अंग में त्वचा से लेकर अस्थि  तक।  यदि कोशिका वृद्धि अनियंत्रित हो तो इसके परिणाम स्वरुप कोशिकाओं की अनियमित गुच्छा बन जाता है इन अनियमित कोशिकाओं के गुच्छे को कैंसर कहते हैं कैंसर को स्थापित होने में जो समय लगता है उसे लैटेण्ड पीरियड कहते हैं ।

कैंसर मुख्यता चार प्रकार के होते हैं ।

(1) कार्सिनोमास - इसकी उत्पत्ति उपकला उतको से होती है ।

(2) सार्कोमास - यह कैंसर संयोजी उतको अस्थि और उपास्थि एवं पेशियों में होता है।

(3) ल्युकीमियास - यह ल्यूकोमाइट्स  में असामान्य वृद्धि के कारण होता है।

(4)  लिम्फोमास - यह कैंसर लसीका गाँठो एवं प्लीहा में  होता है।

अनुवांशिक रोग

वर्णांधता - इसमें रोगी को लाल एवं हरा रंग पहचानने की क्षमता नहीं होती है ।
इस रोग में मुख्य रूप से पुरुष प्रभावित होता है ।

स्त्रियों में यह तभी होता है जब उसके दोनों गुणसूत्र (xx)  प्रभावित हो ।
इस रोग की वाहक स्त्रियां होती हैं ।

(2) हीमोफीलिया - इस रोग में व्यक्ति को चोट लगने पर आधा घंटे से 24 घंटे तक रक्त का थक्का नहीं बनता है ।
यह मुख्यता पुरुषों में होता है ।
स्त्रियों में यह रोग तभी होता है जब उनके दोनों गुणसूत्र प्रभावित हो। इस रोग की वाहक स्त्रियां है । हेंलडन का मानना है कि यह रोग ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया से प्रारंभ हुआ।

(3)  टर्नर सिंड्रोम-  यह रोग स्त्रियों में होता है इस रोग से ग्रसित स्त्रियों में गुणसूत्रों की संख्या 45 होती है इसमें शरीर अल्पविकसित कद छोटा तथा वक्ष चपटा होता है । जननांग प्राय: अविकसित होता है जिससे वह बाँझ होती हैं।

(4)  क्लीनेफेल्टर सिंड्रोम - यह रोग पुरुषों में होता है इस रोग से ग्रसित पुरुषों में गुणसूत्रों की संख्या 47 होती है ।
इसमें पुरुषों का वृषण अल्प विकसित एवं स्तन स्त्रियों के समान विकसित हो जाता है । इस रोग से ग्रसित पुरुष नपुंसक होता है ।

(5) डाउन सिंड्रोम - इस रोग से ग्रसित रोगी मंदबुद्धि आंखें टेढी , जीभ मोटी तथा अनियमित शारीरिक ढांचा होता है । इसे मंगोलिज्म कहते हैं ।

(6) पटाऊ सिंड्रोम - इसमें रोगी का ऊपर का होंठ बीच से कटा होता है तथा तालू में दरार होती है इस रोग से ग्रसित मंदबुद्धि नेत्रदान से प्रभावित हो सकते हैं।

Sunday, October 1, 2017

विषाणु या वायरस से होने वाले रोग

विषाणु का अंग्रेजी शब्द वाइरस का शाब्दिक अर्थ विष होता है। सर्वप्रथम सन
1796 में डाक्टर एडवर्ड जेनर ने पता लगाया कि चेचक, विषाणु के कारण होता है। उन्होंने चेचक के टीके का आविष्कार भी किया।

विषाणु अकोशिकीय अतिसूक्ष्म जीव हैं जो केवल जीवित कोशिका में ही वंश वृद्धि कर सकते हैं।  ये नाभिकीय अम्ल और प्रोटीन से मिलकर गठित होते हैं, शरीर के बाहर तो ये मृत-समान होते हैं परंतु शरीर के अंदर जीवित हो जाते हैं।

इन्हे क्रिस्टल के रूप में इकट्ठा किया जा सकता है। एक विषाणु बिना किसी सजीव माध्यम के पुनरुत्पादन नहीं कर सकता है। यह सैकड़ों वर्षों तक सुशुप्तावस्था में रह सकता है और जब भी एक जीवित मध्यम या धारक के संपर्क में आता है उस जीव की कोशिका को भेद कर आच्छादित कर देता है और जीव बीमार हो जाता है।

एक बार जब विषाणु जीवित कोशिका में प्रवेश कर जाता है, वह कोशिका के मूल आरएनए एवं डीएनए की जेनेटिक संरचना को अपनी जेनेटिक सूचना से बदल देता है और संक्रमित कोशिका अपने जैसे संक्रमित कोशिकाओं का पुनरुत्पादन शुरू कर देती है।

विषाणु                               रोग

(1) HIV                               एड्स

(2) अरबो वायरस                   डेंगूज्वर

(3) पोलियो                          पोलियो

(4) मिक्सो वायरस               इन्फ्लुएंजा

(5) वैरिओला वायरस           चेचक

(6) वैरिसेला                        छोटी माता

(7) मोर्बिली वायरस             खसरा

(8) रैब्डो वायरस                रेबीज

(9) हर्पीस                        हर्पीस

    रोग                              प्रभावित अंग

(1) एड्स                   प्रतिरक्षा प्रणाली

(2) डेंगूज्वर                 सिर, आँख, जोड़

(3) पोलियो                 गला, रीढ़, नाड़ी संस्थान

(4) इन्फ्लुएंजा              सम्पूर्ण शरीर

(5) चेचक                     सम्पूर्ण शरीर

(6) छोटी माता               सम्पूर्ण शरीर

(7) गलसोथ                   पैराथाईराइड ग्रन्थि

(8) खसरा                 सम्पूर्ण शरीर

(9) ट्रेकोमा                    आँख

(10) पीलिया               यकृत

(11) रेबीज                 तंत्रिका तंत्र

(12) मेनिनजाइटिस        मस्तिष्क

(13) हार्पीस                  त्वचा

जीवाणु या बैक्टीरिया द्वारा होने वाले रोग

जीवाणु एक एककोशिकीय जीव है। इसका आकार कुछ मिमी तक ही होता है। इनकी आकृति गोल या मुक्त-चक्राकार आदि आकार की हो सकती है।

ये प्रोकैरियोटिक, कोशिका भित्तियुक्त, एककोशकीय सरल जीव हैं जो प्रायः सर्वत्र पाये जाते हैं। ये पृथ्वी पर मिट्टी में, अम्लीय गर्म जल-धाराओं में, नाभिकीय पदार्थों में
जल में, भू-पपड़ी में, यहाँ तक की कार्बनिक पदार्थों में तथा पौधौं एवं जन्तुओं के शरीर के भीतर भी पाये जाते हैं।

साधारणतः एक ग्राम मिट्टी में 4 करोड़ जीवाणु कोष तथा 1 मिलीलीटर जल में 10 लाख जीवाणु पाए जाते हैं। संपूर्ण पृथ्वी पर अनुमानतः लगभग 5X10 जीवाणु पाए जाते हैं।

जीवाणु                               बीमारी

(1) क्लांस्ट्रीडियम                  टिटनेस

(2) विब्रिओ कालेरी                हैजा

(3) सालमोनेला टाइफी           टायफाइड

(4) माइकोबैक्टीरियम            क्षय रोग

(5) कोरीनी बैक्टीरियम डिप्थीरी  -    डिप्थीरिया

(6) पाश्चुरेला पेस्टिस             प्लेग

(7) हीमोफिलिस परटूसिस       काली खांसी

(8) डिप्लोकोकस न्यूमोनी        निमोनिया

(9) माइकोबैक्टीरियम लेप्री        कोढ़

(10) नाइसेरिया गोनोरियाई       गोनोरिया

(11) टैपोनमा पैलीडम          सिफलिस

    रोग                          प्रभावित अंग

(1) टिटनेस                 तंत्रिका तंत्र

(2) हैजा                    आंत

(3) टायफाइड             आंत

(4) क्षय रोग                फेफड़ा

(5) डिप्थीरिया            श्वास नली  

(6) प्लेग                  फेफड़ा , दोनों पैरो के बीच

(7) काली खांसी         श्वसन तंत्र

(8) निमोनिया              फेफड़ा

(9) कोढ़                   तंत्रिका तंत्र, त्वचा

(10) गोनोरिया            मूत्र मार्ग

(11) सिफलिस            शिश्न