Friday, October 27, 2017

दृष्टि दोष कारण एवं समाधान

आंखों में अपवर्तन दोष के कारण दृष्टि धुंधली हो जाती हैं ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति वस्तु को आराम से सूस्पष्ट देख नहीं पाता है ।

प्रमुख रूप से दृष्टि के तीन सामान्य अपवर्तक दोष होते हैं ।
(1) निकट दृष्टि दोष

(2) दूर दृष्टिदोष

(3) जरा दूरदृष्टिता

दृष्टि दोष होने का कारण-

समंजन क्षमता-

हमारा लेंस रेशेदार जेली जैसे पदार्थो से बना है जो ऊपर और नीचे पक्ष्माभी पेशियों से जुडी होती है ।
जब हम पास की वस्तुओ को देखते है तो ये पेशियाँ सिकुड़ जाती है जिससे लेंस की वक्रता बढ़ जाती है । अब लेंस मोटा हो जाता है ,और प्रतिविम्ब रेटीना पर बनता है।

इसके विपरीत जब हम दूर की वस्तु को देखते है तो पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल पड जाती है और लेंस पतला हो जाता है। और प्रतिविम्ब रेटिना पर बनता है ।

इस प्रकार लेंस की उस क्षमता को समंजन कहते है जिसके द्वारा आँख फोकस दूरी को समायोजित कर के दूर व् पास दोनों वस्तुओ का प्रतिविम्ब रेटिना पर बनाती है।

किसी वस्तु को देखने के लिए प्रतिविम्ब का रेटिना पर बनना आवश्यक है।

हमारी आँखे एक  निश्चित सीमा से अधिक लेंस को मोटा नही कर सकती है । अत: अगर हम किसी वस्तु को बहुत पास से देखे तो उसकी फोकस दुरी रेटिना की दूरी से अधिक हो जाती है । और प्रतिविम्ब रेटिना के पीछे बनता है। हमे वस्तु धुंधला दिखाई देता है।

25 cm से अनंत दूरी तक का प्रतिविम्ब रेटिना पर बनाने में एक स्वस्थ प्क्षमाभी पेशी सक्षम होती है।

जब पक्ष्माभी पेशी ठीक प्रकार से काम नही करती है तो दृष्टी दोष हो जाते है।

(1) दूर दृष्टी दोष- इस दृष्टी दोष में व्यक्ति को दूर की वस्तुये स्पष्ट दिखाई देती है किन्तु पास की वस्तुए धुंधली दिखती है।

इसमें पास की वस्तुए देखने पर पक्ष्माभी पेशियों में खिचाव नही आता जिससे प्रतिविम्ब रेटिना के पीछे बनने लगता है और वस्तुए धुंधली दिखती है।

इस दृष्टी दोष को दूर करने के उत्तल लेंस का प्रयोग करते है जिससे फोकस दूरी कम होकर प्रतिविम्ब रेटिना पर बनने लगता है।

(2) निकट दृष्टि दोष - इस दोष में पास की वस्तुए साफ़ दिखाई देती है जबकि दूर की वस्तुए धुंधली दिखाई देती है।

इस दोष में प्रतिविम्ब रेटिना के पहले ही बनने लगता है । अवतल लेंस का प्रयोग कर हम फोकस दूरी को बढ़ा देते है जिससे प्रतिविम्ब रेटिना पर बनने लगता है।

(3) जरा दूरदृष्टी दोष - इसमें व्यक्ति को दूर व् पास दोनों की वस्तुए धुंधली दिखाई देती है।

यह समस्या आयु अधिक होने पर होती है इस दोष में पक्ष्माभी पेशियों में शिथिल होने एवं सिकुड़ने दोनो ही गुण खत्म हो जाते है।

इस दोस को द्विफोकसी लेंस का प्रयोग कर के दूर करते है ।

द्विफोकसी लेंस - इन लेंसो में ऊपर का भाग अवतल लेंस तथा नीचे उत्तल लेंस लगा होता है।

Wednesday, October 4, 2017

फंफूद और हैल्मिन्थ्स से होने वाले रोग

हैल्मिन्थस से होने वाले रोग -

(1) अतिसार - इस रोग का कारण आंत में मौजूद एस्केरिस लुम्ब्रीकाइड़ीज नामक अंतः परजीवी प्रोटोजोआ (निमेटोड ) है जो घरेलू मक्खी द्वारा प्रसारित होता है इससे आंत  में घाव हो जाता है जिसमें प्रोटीन पचाने वाला एंजाइम ट्रिपसिन नष्ट हो जाता है यह रोग बच्चों में अधिक पाया जाता है ।

(2) फाइलेरिया - यह रोग फाइलेरिया बैन्क्रोफ्टाई  नामक कृमि  से होता है इस कृमि का संचारण क्यूलेक्स मच्छरों के दंस से होता है इस रोग में पैरों वृष्णकोषों तथा शरीर के अन्य भागों में सूजन हो जाती है इस रोग को हाथी पाव भी कहते हैं।

फफूंद से होने वाले रोग -

(1) दमा - मनुष्य के फेफड़ों में एस्पर्जिलस  फ्यूमिगेटस नामक कवक के स्पोर पहुंच कर वहां जाल बनाकर फेफड़ों का काम अवरुद्ध कर देते हैं यह एक संक्रामक रोग है ।

(2) एथलीट फुट -  यह  रोग टीनिया पेडिस नामक कवक से होता है यह त्वचा का संक्रामक रोग है जो पैरों की त्वचा के फटने कटने और मोटे होने से होता है।

(3) खाज  - यह रोग एकेरस स्केबीज  नामक कवक  से होता है जिससे त्वचा में खुजली होती है और सफेद दाग पड़ जाते है ।

(4) गंजापन - यह टीनिया केपिटिस नामक  कवक से होता है इससे सिर के बाल गिर जाते हैं ।

(5) दाद-  यह रोग  ट्राईकोफायटन लेरुकोसम नामक कवक से फैलता है यह संक्रामक रोग है इससे त्वचा पर लाल रंग की गोली पड़ जाते हैं।

प्रमुख चिकित्सा उपकरण

(1) पेसमेकर - हृदय की गति कम हो जाने पर उसे सामान्य अवस्था में लाने हेतु इसका प्रयोग किया जाता है।

(2) कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन (सीटी स्कैन) - संपूर्ण शरीर में किसी असामान्य विकृति का पता लगाने हेतु इसका प्रयोग किया जाता है ।

(3) इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ - हृदय संबंधी असमान्यताओं का पता लगाने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है ।

(4) ऑटो एनालाइजर - ग्लुकोज, यूरिया एवम कैस्ट्रॉल इत्यादि की जांच के लिए इसका प्रयोग किया जाता है ।

(5) इलेक्ट्रो इन्सेफैलोग्राफ - मस्तिष्क की विकृतियों का पता लगाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

Tuesday, October 3, 2017

कुछ प्रमुख रोग

(1) पक्षाघात या लकवा - इस रोग  में कुछ ही मिनटों में शरीर के आधे भाग को लकवा मार जाता है जहां पक्षाघात होता है वहां की तंत्रिकाएं निष्क्रिय हो जाती है इसका कारण अधिक रक्त दाब के कारण मस्तिष्क की कोई धमनी का फट जाना या मस्तिष्क को अपर्याप्त रक्त की आपूर्ति होना है ।

(2) एलर्जी - कुछ वस्तुओं जैसे धूल, धुआं ,रसायन कपड़ा, सर्दी , आदि विशेष व्यक्तियों के लिए हानिकारक हो जाते हैं और उनके शरीर में विपरीत क्रिया होने लगती है जिससे अनेक बीमारियां हो जाती है जैसे खुजली या फोड़ा ,फुंसी शरीर में सूजन आ जाना, काला दाग ,एग्जिमा आदि एलर्जी के उदाहरण है।

(3) साइजोफ्रेनिया - यह मानसिक रोग है जो प्रायः युवा वर्ग में होता है ऐसा रोगी कल्पना को ही सत्य मानता है और वास्तविकता को नहीं।

ऐसे रोगी आलसी , अलगावहीन ,आवेशहीन होते हैं विद्युत आवेश चिकित्सा इसमें काफी सहायक होती है।

(4) मिर्गी - इसे अपस्मार रोग कहते हैं यह मस्तिष्क की आंतरिक रोगों के कारण होती है इस रोग में जब दौरा पड़ता है तो मुंह से झाग निकलने लगता है और मल पेशाब भी निकलता है ।

(5) डिपलोपिया - यह रोग आँखों  की मांसपेशियों की पक्षाघात के कारण होती है ।

(6) कैंसर - मनुष्य के शरीर के किसी भी अंग में त्वचा से लेकर अस्थि  तक।  यदि कोशिका वृद्धि अनियंत्रित हो तो इसके परिणाम स्वरुप कोशिकाओं की अनियमित गुच्छा बन जाता है इन अनियमित कोशिकाओं के गुच्छे को कैंसर कहते हैं कैंसर को स्थापित होने में जो समय लगता है उसे लैटेण्ड पीरियड कहते हैं ।

कैंसर मुख्यता चार प्रकार के होते हैं ।

(1) कार्सिनोमास - इसकी उत्पत्ति उपकला उतको से होती है ।

(2) सार्कोमास - यह कैंसर संयोजी उतको अस्थि और उपास्थि एवं पेशियों में होता है।

(3) ल्युकीमियास - यह ल्यूकोमाइट्स  में असामान्य वृद्धि के कारण होता है।

(4)  लिम्फोमास - यह कैंसर लसीका गाँठो एवं प्लीहा में  होता है।

अनुवांशिक रोग

वर्णांधता - इसमें रोगी को लाल एवं हरा रंग पहचानने की क्षमता नहीं होती है ।
इस रोग में मुख्य रूप से पुरुष प्रभावित होता है ।

स्त्रियों में यह तभी होता है जब उसके दोनों गुणसूत्र (xx)  प्रभावित हो ।
इस रोग की वाहक स्त्रियां होती हैं ।

(2) हीमोफीलिया - इस रोग में व्यक्ति को चोट लगने पर आधा घंटे से 24 घंटे तक रक्त का थक्का नहीं बनता है ।
यह मुख्यता पुरुषों में होता है ।
स्त्रियों में यह रोग तभी होता है जब उनके दोनों गुणसूत्र प्रभावित हो। इस रोग की वाहक स्त्रियां है । हेंलडन का मानना है कि यह रोग ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया से प्रारंभ हुआ।

(3)  टर्नर सिंड्रोम-  यह रोग स्त्रियों में होता है इस रोग से ग्रसित स्त्रियों में गुणसूत्रों की संख्या 45 होती है इसमें शरीर अल्पविकसित कद छोटा तथा वक्ष चपटा होता है । जननांग प्राय: अविकसित होता है जिससे वह बाँझ होती हैं।

(4)  क्लीनेफेल्टर सिंड्रोम - यह रोग पुरुषों में होता है इस रोग से ग्रसित पुरुषों में गुणसूत्रों की संख्या 47 होती है ।
इसमें पुरुषों का वृषण अल्प विकसित एवं स्तन स्त्रियों के समान विकसित हो जाता है । इस रोग से ग्रसित पुरुष नपुंसक होता है ।

(5) डाउन सिंड्रोम - इस रोग से ग्रसित रोगी मंदबुद्धि आंखें टेढी , जीभ मोटी तथा अनियमित शारीरिक ढांचा होता है । इसे मंगोलिज्म कहते हैं ।

(6) पटाऊ सिंड्रोम - इसमें रोगी का ऊपर का होंठ बीच से कटा होता है तथा तालू में दरार होती है इस रोग से ग्रसित मंदबुद्धि नेत्रदान से प्रभावित हो सकते हैं।

Sunday, October 1, 2017

विषाणु या वायरस से होने वाले रोग

विषाणु का अंग्रेजी शब्द वाइरस का शाब्दिक अर्थ विष होता है। सर्वप्रथम सन
1796 में डाक्टर एडवर्ड जेनर ने पता लगाया कि चेचक, विषाणु के कारण होता है। उन्होंने चेचक के टीके का आविष्कार भी किया।

विषाणु अकोशिकीय अतिसूक्ष्म जीव हैं जो केवल जीवित कोशिका में ही वंश वृद्धि कर सकते हैं।  ये नाभिकीय अम्ल और प्रोटीन से मिलकर गठित होते हैं, शरीर के बाहर तो ये मृत-समान होते हैं परंतु शरीर के अंदर जीवित हो जाते हैं।

इन्हे क्रिस्टल के रूप में इकट्ठा किया जा सकता है। एक विषाणु बिना किसी सजीव माध्यम के पुनरुत्पादन नहीं कर सकता है। यह सैकड़ों वर्षों तक सुशुप्तावस्था में रह सकता है और जब भी एक जीवित मध्यम या धारक के संपर्क में आता है उस जीव की कोशिका को भेद कर आच्छादित कर देता है और जीव बीमार हो जाता है।

एक बार जब विषाणु जीवित कोशिका में प्रवेश कर जाता है, वह कोशिका के मूल आरएनए एवं डीएनए की जेनेटिक संरचना को अपनी जेनेटिक सूचना से बदल देता है और संक्रमित कोशिका अपने जैसे संक्रमित कोशिकाओं का पुनरुत्पादन शुरू कर देती है।

विषाणु                               रोग

(1) HIV                               एड्स

(2) अरबो वायरस                   डेंगूज्वर

(3) पोलियो                          पोलियो

(4) मिक्सो वायरस               इन्फ्लुएंजा

(5) वैरिओला वायरस           चेचक

(6) वैरिसेला                        छोटी माता

(7) मोर्बिली वायरस             खसरा

(8) रैब्डो वायरस                रेबीज

(9) हर्पीस                        हर्पीस

    रोग                              प्रभावित अंग

(1) एड्स                   प्रतिरक्षा प्रणाली

(2) डेंगूज्वर                 सिर, आँख, जोड़

(3) पोलियो                 गला, रीढ़, नाड़ी संस्थान

(4) इन्फ्लुएंजा              सम्पूर्ण शरीर

(5) चेचक                     सम्पूर्ण शरीर

(6) छोटी माता               सम्पूर्ण शरीर

(7) गलसोथ                   पैराथाईराइड ग्रन्थि

(8) खसरा                 सम्पूर्ण शरीर

(9) ट्रेकोमा                    आँख

(10) पीलिया               यकृत

(11) रेबीज                 तंत्रिका तंत्र

(12) मेनिनजाइटिस        मस्तिष्क

(13) हार्पीस                  त्वचा

जीवाणु या बैक्टीरिया द्वारा होने वाले रोग

जीवाणु एक एककोशिकीय जीव है। इसका आकार कुछ मिमी तक ही होता है। इनकी आकृति गोल या मुक्त-चक्राकार आदि आकार की हो सकती है।

ये प्रोकैरियोटिक, कोशिका भित्तियुक्त, एककोशकीय सरल जीव हैं जो प्रायः सर्वत्र पाये जाते हैं। ये पृथ्वी पर मिट्टी में, अम्लीय गर्म जल-धाराओं में, नाभिकीय पदार्थों में
जल में, भू-पपड़ी में, यहाँ तक की कार्बनिक पदार्थों में तथा पौधौं एवं जन्तुओं के शरीर के भीतर भी पाये जाते हैं।

साधारणतः एक ग्राम मिट्टी में 4 करोड़ जीवाणु कोष तथा 1 मिलीलीटर जल में 10 लाख जीवाणु पाए जाते हैं। संपूर्ण पृथ्वी पर अनुमानतः लगभग 5X10 जीवाणु पाए जाते हैं।

जीवाणु                               बीमारी

(1) क्लांस्ट्रीडियम                  टिटनेस

(2) विब्रिओ कालेरी                हैजा

(3) सालमोनेला टाइफी           टायफाइड

(4) माइकोबैक्टीरियम            क्षय रोग

(5) कोरीनी बैक्टीरियम डिप्थीरी  -    डिप्थीरिया

(6) पाश्चुरेला पेस्टिस             प्लेग

(7) हीमोफिलिस परटूसिस       काली खांसी

(8) डिप्लोकोकस न्यूमोनी        निमोनिया

(9) माइकोबैक्टीरियम लेप्री        कोढ़

(10) नाइसेरिया गोनोरियाई       गोनोरिया

(11) टैपोनमा पैलीडम          सिफलिस

    रोग                          प्रभावित अंग

(1) टिटनेस                 तंत्रिका तंत्र

(2) हैजा                    आंत

(3) टायफाइड             आंत

(4) क्षय रोग                फेफड़ा

(5) डिप्थीरिया            श्वास नली  

(6) प्लेग                  फेफड़ा , दोनों पैरो के बीच

(7) काली खांसी         श्वसन तंत्र

(8) निमोनिया              फेफड़ा

(9) कोढ़                   तंत्रिका तंत्र, त्वचा

(10) गोनोरिया            मूत्र मार्ग

(11) सिफलिस            शिश्न

परजीवी या प्रोटोजोआ से होने वाले रोग

परजीवी का मतलब होता है दूसरे जीवो पर आश्रित जीव. परजीवी प्राणियों मे जूँ जो मनुष्यों के साथ साथ बाल वाले जानवरो में भी होते है। चिलुआ जो पसीने की गन्ध से कपडों मे पैदा हो जाते है।

किलनी जो जानवरों के मुलायम अंगो मे चिपट कर खून चूसते रहते है जोंक जो गन्दे पानी मे रहती है और शरीर से चिपट कर खून को चूसती है।

यह जिन्दा जीवो से अपने आहार को लेने के लिये माने जाते है साथ ही जो जीवो के मांस पर ही आधारित होते है वह जीवो को मारकर अपना पेट भरने के लिये भी जाने जाते है और परजीवी के रूप मे अन्य जीवो पर आश्रित होते है।

परिभाषा :- वे जीव जो दुसरे जीवो को मारे बिना उनसे पोषण प्राप्त करते हैं , परजीवी कहलाते हैं।

परजीवी                                          रोग

(1) प्लाजमोडियम                     मलेरिया

(2) एन्टअमीबा जिन्जीवेलिस          पायरिया

(3) ट्रिपेनोसोमा                          सोने की बीमारी

(4) एंटअमीबा हिस्टोलिटिका         पेचिस

(5) लीशमैनिया डोनावानी              काला ज्वार

रोग                                    वाहक

(1) मलेरिया               मादा एनाफ्लीज (मच्छर)

(2) सोने की बिमारी         सी सी मक्खी

(3) काला ज्वार             बालू मक्खी


रोग                                  लक्षण

(1) मलेरिया       ठण्ड के साथ तेज बुखार

(2) पायरिया      मसूढो से रक्त निकलना

(3) सोने की बीमारी    बहुत नीद के साथ बुखार

(4) पेचिस             श्लेष्मा एवं खून के साथ दस्त

(5) काला ज्वार         तेज बुखार



Friday, September 29, 2017

जीव विज्ञान और उसकी प्रमुख शाखाए

                 जीव विज्ञान

जीव विज्ञान प्राकृतिक विज्ञान की तीन विशाल शाखाओं में से एक है। यह विज्ञान जीव, जीवन और जीवन के प्रकृया से सम्बन्धित है । इस विज्ञान में पेड़-पौधों और जानवरों के अभ्युदय, इतिहास, भौतिक गुण, जैविक प्रक्रम, कोशिका, आदत, इत्यादि का अध्ययन किया जाता है इसे अंग्रेजी में बायोलॉजी (Biology) कहते है यह Bio + logos से बना है इसमें bio का अर्थ है जीवन ( life) और logos का अर्थ है अध्ययन (study)  ।

अर्थात जीवन का अध्ययन ही बायोलॉजी कहलाता है जीव विज्ञान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग  लैमार्क (फ्रांस) ने एवं ट्रेविरेनस (जर्मनी) नामक  वैज्ञानिकों ने 1801ई में किया था ।

जीव विज्ञान का क्रमबद्ध ज्ञान के रूप में विकास प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक अरस्तु के काल में हुआ उन्होंने ही सर्वप्रथम पौधों एवं जंतुओं के जीवन के विभिन्न पक्षों के विषय में अपने विचार प्रकट किए इसलिए अरस्तु को जीव विज्ञान का जनक कहा जाता है इन्हें जंतु विज्ञान के जनक के रूप में भी जाना जाता है।

           जीव विज्ञान की कुछ प्रमुख शाखाये

(1) एपीकल्चर  - मधुमक्खी पालन का अध्ययन

(2) सेरीकल्चर - रेशम कीट पालन का अध्ययन

(3) पीसीकल्चर - मत्स्य पालन का अध्ययन

(4) माइकोलोजी - कवको का अध्ययन

(5) फाइकोलॉजी - शैवालों का अध्ययन

(6) एंथोलॉजी  - पुष्पों का अध्ययन

(7) पोमोलॉजी -फलों का अध्ययन

(8)ऑरनिर्थोलॉजी - पंछियों का अध्ययन

(9) इक्थ्योलॉजी -  मछलियों का अध्ययन

(10) एन्टोमोलॉजी - कीटो का अध्ययन

(11) डेन्ड्रोलॉजी -  वृक्षों एवं झाड़ियो का अध्ययन

(12) ओफियोलॉजी - सर्पो का अध्ययन

(13)सॉरोलॉजी - छिपकली का अध्ययन

(14) सिल्वीकल्चर - काष्ठी  पेड़ों का अध्ययन

Thursday, September 21, 2017

आक्सीजन

ऑक्सीजन, धरती का तीसरा सबसे ज्यादा पाया जाने वाला तत्व (elememt) है. सबसे अधिक हाॅइड्रोजन और फिर  हिलियम पाया जाता है ।

ऑक्सीजन सभी प्राणियों के लिए बहुत आवश्यक है ऑक्सीजन रंगहीन, स्वादहीन तथा गंधरहित गैस है इसका रासायनिक सूत्र O है और इसको हिंदी में प्राणवायु या जारक भी कहा जाता है।

आक्सीजन की खोज -
ऑक्सीजन गैस की खोज 1772 में सर्वप्रथम स्वीडन के शीले नामक वैज्ञानिक ने की थी। ऑक्सीजन की खोज, प्राप्ति अथवा प्रारंभिक अध्ययन में जे. प्रीस्टले और सी.डब्ल्यू. शीले ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था कार्ल शीले ने पोटैशियम नाइट्रेट को गर्म करके आक्सीजन गैस तैयार किया पर उनका कार्य बाद में उजागर हुआ एन्टोनी लैवोइजियर ने इस गैस के गुणों का वर्णन किया तथा इसका नाम आक्सीजन रखा, जिसका अर्थ है – ‘अम्ल उत्पादक’

ऑक्सीजन का भौतिक गुण:

द्रव ऑक्सीजन नीला होता है और  वायु से कुछ भारी भी होता है यदि हम आक्सीजन को ठंडा करते है तो ऑक्सीजन नीले रंग के द्रव में परिवर्तित हो जाएगी।

ऑक्सीजन जलने में या जलाने में सहायक होती है लेकिन अपने आप कभी भी नहीं जलती। ऑक्सीजन गैस की प्रकृति अनुचुम्बकीय है।

किन्तु लिक्विड ऑक्सीजन मैग्नेटिक होती है. मतलब, एक पावरफुल चुंबक के साथ यह चारों तरफ घुमाई जा सकती है. यहाँ तक कि एक जगह से उठाई भी जा सकती है.।

आक्सीजन के रासायनिक गुण-

हवा से ऑक्सीजन अलग करने के लिए अब द्रव हवा का अत्यधिक उपयोग होता है, जिसके प्रभाजित आसवन से ऑक्सीजन प्राप्त किया जाता है,

पानी के इलेक्ट्रॉलिसिस से हाइड्रोजन के उत्पादन में ऑक्सीजन भी बाइप्रॉडक्ट के रूप में मिलता है
ऑक्सीजन प्राप्त करने के विचार से कुछ अन्य ऑक्साइड भी जैसे ताँबा, पारा आदि के ऑक्साइड इसी प्रकार उपयोगी हैं
.
बहुत से तत्व ऑक्सीजन से सीधा संयोग करते हैं। इनमें कुछ जैसे फॉस्फोरस, सोडियम इत्यादि तो साधारण ताप पर ही धीरे-धीरे क्रिया करते हैं, परंतु अधिकतर, जैसे कार्बन, गंधक, लोहा, मैग्नीशियम इत्यादि, गरम करने पर ऑक्सीजन से भरे बर्तन में ये वस्तुएँ दहकती हुई अवस्था में डालते ही जल उठती हैं और जलने से ऑक्साइड बनता है। ऑक्सीजन में हाइड्रोजन गैस जलती है तथा पानी बनता है। यह क्रिया इन दोनों के गैसीय मिश्रण में विद्युत चिनगारी से अथवा उत्प्रेरक की उपस्थिति में भी होती है।

जब बेरियम ऑक्साइड को गर्म किया जाता है लगभग 500° सेंटीग्रेड तक तब वह हवा से ऑक्सीजन लेकर परॉक्साइड बनाता है। अधिक तापक्रम लगभग 800° सेंटीग्रेड पर इसके विघटन से ऑक्सीजन प्राप्त होता है तथा पुन: उपयोग के लिए बेरियम ऑक्साइड बचा रहता है। औद्योगिक उत्पादन के लिए ब्रिन विधि इसी क्रिया पर आधारित थी।

आक्सीजन एवं जीव -

(1) हमारे शरीर की 90% एनर्जी ऑक्सीज़न की वजह से आती है. भोजन, पानी से तो केवल 10% मिलती है.।

(2) नाइट्रोज़न की तुलना में ऑक्सीज़न
पानी में 2 गुणा ज्यादा घुलनशील है. इसी से जलीय जीवन सम्भव हुआ है अगर ये नाइट्रोजन जितनी ही घुलनशील होती तो जल में जन्तुओ का जीवन सम्भव नही हो पाता।

(3) आदमी के खून में ऑक्सीजन का स्तर 12 से 14 किलोपास्कल तक रहता है।

आक्सीजन की कमी से होने वाले रोग -

सामान्य तौर पर शरीर में ऑक्सीजन का स्तर 95 से 100 प्रतिशत तक होता है। जब शरीर में ऑक्सीजन का स्तर 90% से नीचे जाता है तो उसे ऑक्सीजन की कमी माना जाता है।

आक्सीजन की कमी से मुख्यता: हाइपोजिमिया रोग होता है ।
यदि शरीर के विभिन्न अंगों जैसे, मस्तिष्क, लिवर और किड़नी समेत अनेकों अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिले तो यह भी डेमेज हो सकते हैं।

तथा मिर्गी, लकवा , कैंसर आदि रोगों के लिए भी आक्सीजन की कमी जिम्मेदार होती है।

ऑक्सीजन की कमी से शरीर अम्लीय हो जाता है।
कैंसर की कोशिकाएं (Cells) अवायवीय अर्थात ऑक्सीजन के बिना जीवित रहने वाली ) होती है जिस शरीर में ऑक्सीजन अधिक होगी वहां कैंसर की कोशिकाए जीवित नहीं रह सकती।

आक्सीजन की प्राकृतिक रूप से प्राप्ति -

(1) जमीन का अधिकांश हिस्सा समुद्री होने की वजह से समुद्री पौधे पृथ्वी को सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं।  वातावरण में मौजूद 70 से 80 फीसदी ऑक्सीजन समुद्री पौधे की द्वारा ही बनाई जाती है। ये पौधे जमीनी पौधों से ज्यादा ऑक्सीजन बनाते हैं।

(2)  बांस , नीम, बरगद, तुलसी ,पीपल के पेड़ की तरह नीम, बरगद और तुलसी के पेड़ भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देते हैं। नीम, बरगद, तुलसी के पेड़ एक दिन में 20 घंटों से ज्यादा समय तक ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं। जबकि पीपल 22 घंटे से भी ज्यादा ।
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Wednesday, September 20, 2017

विटामिन एवं उनके रासायनिक नाम

विटामिन की खोज एक डच जीवाणु विशेषज्ञ, क्रिश्चियान एइकमैन (1858-1930) द्वारा अचानक ही हो गई थी। उन्होंने सबसे पहले ध्यान दिया कि जो मुर्गियां चावल के दाने खाती थीं वे बीमार पड़ गईं।

उन्होंने यह कारण खोज निकाला कि अनाज की ऊपरी सतह को यदि हटा दिया जाए तो उसमें मौजूद रसायन भी निकल जाते हैं जिसे हम विटामिन कहते हैं।
जब एइकमैन 1886 में इंडोनेशिया दौरे पर ‘बेरी-बेरी’ नामक महामारी की पड़ताल करने गए तो उनके दावों को और अधिक सच माना गया। बाद में वह यह साबित करने में सक्षम रहे कि ‘बेरी-बेरी’ का रोग डाइट की कमी से होता है। इससे विटामिन्स की खोज हुई और यह बात सामने आई कि विटामिन सेहत के लिए बहुत जरूरी है।

एइकमैन, हालांकि पूरी तरह से विटामिन्स के बारे में नहीं समझ पाए। बाद में फैडरिक हॉपकिन जो ब्रिटिश वैज्ञानिक थे, ने इस सिद्धांत को समझा कि मानव शरीर को कुछ मात्रा में ऐसे रसायनों की आवश्यकता है जो उन्हें सेहतमंद रख सकें।

उन्होंने यह कहा कि रिकेट्स या स्कर्वी जैसे रोगों से बचा जा सकता है यदि भोजन में या किसी दूसरी चीज में जरूरी रसायन यानी कि विटामिन्स लिए जाएं। ऐसा बिल्कुल सही माना ग

या और विटामिन्स के प्रकारों को नाम भी दिए गए।
वास्तव में विटामिन्स के कई स्रोत तथा उपयोग हैं जैसे विटामिन ‘ए’, मक्खन, दूध, अंडे, हरी सब्जियों और मछली में पाया जाता है जो बीमारियों से लडऩे में सहायक होते हैं। विटामिन ‘बी’ भूख बढ़ाता है। यह तंत्रिकाओं तथा त्वचा में शक्ति बढ़ाता है। यह यीस्ट, मीट तथा अलग-अलग अनाजों में पाया जाता है। विटामिन ‘सी’ खून साफ करने में सहायक है तथा जुकाम से सुरक्षा प्रदान करता है। यह मुख्य तौर पर फल जैसे संतरे तथा नींबू आदि में पाया जाता है।
हड्डियों की मजबूती के लिए विटामिन ‘डी’ की आवश्यकता होती है जो कॉड मछली के तेल तथा अंडे की जर्दी आदि में पाया जाता है। विटामिन ‘ई’ मोटे अनाजों और अन्य प्रकार के भोजन में पाया जाता है। विटामिन ‘के’ खून के बहाव को रोकने और क्लॉट के लिए विशेष रूप से जरूरी है। अत: चोट लगने पर खून के रिसाव को रोकने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। यह बहुत सी चीजों में मौजूद होता है जैसे लिवर तथा हरी सब्जियों इत्यादि में।

ऊपर दिए गए तथ्यों से हमें पता चलता है कि विटामिन्स हमारी सेहत के लिए बहुत जरूरी हैं। इस महत्वपूर्ण खोज के लिए क्रिश्चियान एइकमैन और फैडरिक हॉपकिन को 1929 में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था।

विटामिन जटिल कार्बनिक पदार्थ होते हैं तथा शरीर की उपापचयी क्रियाओं में भाग लेते हैं। इन्हें वृद्धिकारक भी कहते हैं। इनकी कमी से अपूर्णता रोग हो जाते हैं। ये कार्बन ,
हाइड्रोजन , ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा
गन्धक आदि तत्वों से बने सक्रिय एवं जटिल कार्बनिक यौगिक हैं। ये अल्पांश में हमारे शरीर को स्वस्थ एवं निरोग रखने के लिए आवश्यक होते हैं। इनकी कमी से अनेक रोग हो जाते हैं।

इन्हें दो वर्गों में विभक्त किया जाता है-

(1)  जल में घुलनशील विटामिन, जैसे- विटामिन 'B', 'C'।

(2) वसा में घुलनशील विटामिन, जैसे-
विटामिन 'A' , ' D ', 'K' आदि।

विटामिन की खोज एफ.जी. हाफकिन्स ने की थी, परन्तु इसे विटामिन का नाम फुन्क महोदय ने दिया।प्रश्नों में बिटामिन का खोज कर्ता फुन्क को ही माना जाता है । इसने विटामिन की खोज 1911 में की थी।

विटामिन का निर्माण अलग अलग अंगो में होता है

विटामिन कार्बनिक यौगिक है, जो शरीर के विकास एवं रोगों से रक्षा के लिए आवश्यक है। ये ऊतकों में एन्जाइम का निर्माण करते है। विटामिन "डी" हमारे शरीर में स्वतः बनता है

जबकि विटामिन "के" आंत्र में उपस्थित ‘कोलोन’ नामक वैक्टीरिया बनाता है।

                 विटामिन         -    रासायनिक नाम

(1) विटामिन A            -  रेटिनॉल

(2) विटामिन B1         -   थायमिन

(3) विटामिन B2        - राइबोफ्लेविन

(4) विटामिन B3         -   पैन्टोथेनिक अम्ल

(5) विटामिन B5         -   नियासिन/ निकोटिनैमाइड

(6) विटामिन B6        -   पाइरीडॉक्सिन

(7) विटामिन बी7       -   बायोटीन

(8) विटामिन  B12      -  सायनोकाबालामिन

(9) फ़ोलिक अम्ल      -    टेरोइल ग्लूटैमिक

(10) विटामिन C      -   एस्कार्बिक अम्ल

(11) विटामिन D       -  कैल्सिफेराल

(12) विटामिन E        -  टोकोफेरोल

(13) विटामिन K        -  फिलोक्विनोन